वह आए। अपने मन की की। फिर वह थोड़ा नरम पड़े। और फिर चले गए।
मैं अफगानिस्तान की तालिबान-नीत सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी की भारत यात्रा के दौरान हुई घटनाओं की तरफ इशारा कर रही हूँ। यात्रा सबसे ज्यादा अफगानी दूतावास, जो अभी तक आधिकारिक रूप से उनकी सरकार के नियंत्रण में नहीं है, में प्रेस वार्ता के लिए याद की जाएगी जिसमें से महिला पत्रकारों को दूर रखा गया।
भारत में मीडिया के आम उपभोक्ताओं के लिए यह खास दिलचस्पी की बात नहीं थी। हालांकि, मुख्यधारा के मीडिया में इसका थोड़ा ज़िक्र आया पर इसे बहुत तूल नहीं दिया गया। लेकिन सोशल मीडिया और पत्रकार संगठनों के विरोध दर्शाते बयानों ने स्पष्ट कर दिया कि यह अस्वीकार्य है और सरकार को ऐतराज जताना चाहिए था।
हमारी सरकार ने दावा किया कि उसका इस फैसले से कोई लेना-देना नहीं था। और मुत्तकी ने ज़ोर देकर कहना चाहा कि यह एक तकनीकी मामला था। लेकिन इसमें से कुछ भी सच नहीं है।
हमसे इस विवाद पर खाक डालने की उम्मीद की जाती है क्योंकि आखिरकार कई विपक्षी नेताओं और अन्य के ऐतराज जताने के बाद तालिबान मंत्री नरम पड़े और एक प्रेस वार्ता की जिसमें महिला पत्रकारों को पहली कतार में बिठाया गया। और उनमें से कइयों ने मौजूं सवाल किए जैसे उनकी सरकार ने महिलाओं की शिक्षा पर पाबंदियाँ क्यों लगाईं? जाहिर है, मुत्तकी बिदके और दावा किया कि अफगानिस्तान में महिलाएं शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और सब कुछ ठीक है।
जब ऐसी प्रेस वार्ता होती है तो क्या सिर्फ मंत्री ने जो कहा रिपोर्ट किया जाना चाहिए भले वह सही न हो? शायद ही किसी मीडिया ने प्रेस वार्ता की खबर के साथ तथ्यों को परखने की जरूरत महसूस की। वास्तव में, जब से तालिबान ने अफगानिस्तान की बागडोर संभाली है, यानि अगस्त 2021 से, 100 से ज्यादा फरमानों की शृंखला के जरिए प्राइमरी स्कूलों को छोड़कर शैक्षणिक संस्थानों से प्रतिबंधित की गई हैं, कई पेशों में इन्हें कार्य करने से रोक दिया गया है, और बिना पुरुष साथी के कहीं आना-जाना मुश्किल कर दिया गया है।
वैसे भी अफगानिस्तान के बारे में हमारे मीडिया में बहुत कम ही छपता है, अपवाद के तौर पर पाकिस्तान के साथ अफ़ग़ानिस्तान के चल रहे संघर्ष के बारे में सामग्री को छोड़कर। तो ऐसे में लोगों को शायद ही पता हो कि मंत्री की बात को कैसे लिया जाए? इसीलिए, ऐसे देश में जहां प्रेस की आजादी का दम भरा जाता है, वहाँ के मीडिया की यह जिम्मेवारी है कि वह तथ्यों की जांच करे और पाठकों और दर्शकों को अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं जिस कठोर सच्चाई का सामना कर रही हैं, के बारे में बताए।
पर, मुख्यधारा के मीडिया से इस तरह की फ़ैक्ट चेकिंग करने की उम्मीद कुछ ज्यादा ही हो जाएगी। आखिरकार, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री समेत नेताओं का ऐसे ‘तथ्यों’ जिनका सच से कोई वास्ता नहीं होता, जैसे ‘भारत में बदलते आबादी संतुलन के खतरे’ की जस की तस रेपोर्टिंग रोजमर्रा की बात है। (इस पर क्विन्ट ने हाल में एक जरूरी तथ्यपरक लेख प्रकाशित किया है)।
इस विवाद का दूसरा पहलू महिला पत्रकारों से जुड़ा है। आज वह मीडिया में प्रस्तुतकर्ताओं, ऐंकरों, रिपोर्टरों और विश्लेषकों के रूप में प्रमुखता से हैं और ऐसे विषयों को कवर कर रही हैं जो पुराने समय की महिला पत्रकार नहीं कर पाती थीं। जैसे विदेश मामले, रक्षा मामले और यहाँ तक कि कारोबार व वित्त से जुड़े मामले, जहां महिला पत्रकार लगभग न के बराबर होती थीं। अब यह बदल गया है और ऐसा मीडिया घराने चलाने वाले पुरुषों (अब भी अधिकांश पुरुष ही हैं) की दयानतदारी के कारण नहीं, महिलाओं के खुद को साबित करने के कारण हुआ है।
जैसा कि मुत्तकी की प्रेस वार्ता से महिला पत्रकारों को दूर रखने के बारे में ऐश्वर्या खोसला ने इंडियन एक्स्प्रेस में लिखा, “पत्रकारिता में महिलाओं के लिए यह पल कूटनीति से गहरा था। इसने एक पुराने घाव को कुरेदा। हमने युद्ध, चुनाव, उग्रवाद कवर किया है। हमें चुप कराया गया है, किनारे किया गया है लेकिन हम कक्ष में बने रहे। लेकिन किसी आदेश से बाहर करना और वह भी दिल्ली जैसी जगह पर एक निश्चित विराम चिन्ह जैसा था, पूर्ण विराम, एक ऐसे किस्से पर जो आगे बढ़ना चाहता था।”
नियमित तौर पर ऐसे कार्यक्रम कवर करने वाली महिला पत्रकारों ने 8 अक्टूबर को जो सदमा महसूस किया, समझा जा सकता था, मुझे इससे भी बुरा यह लगा कि वहाँ आमंत्रित एक भी पुरुष पत्रकार ने ऐतराज करने की नहीं सोची। वह उनकी हमपेशा सहयोगी थीं। निश्चित रूप से, किसी को भी लिंग के आधार पर या किसी भी आधार पर बाहर करना अस्वीकार्य होना चाहिए। ना ही उन मीडिया संस्थानों, जहां महिलाएं कार्यरत हैं, आधिकारिक रूप से विरोध दर्शाया कि उनकी प्रतिनिधि को बाहर रखा गया। यह मीडिया के हालात बारे में बहुत कुछ कहता है।
इसके विपरीत, अमेरिका में लगभग समूचे मुख्यधारा के मीडिया ने पेन्टागन में प्रवेश के अपने बैज लौटा दिए हैं क्योंकि उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से रेपोर्टिंग के उनके अधिकार को त्यागने की अन्डरटेकिंग देने के लिए कहा गया था। सरकार की तरफ से इस तरह की पाबंदी, ऐसे देश में जहां फर्स्ट अमेंडमेंट के तहत प्रेस की आजादी है, अभूतपूर्व है।
इस विवाद का तीसरा पहलू अफगानिस्तान में आम लोगों को प्रभावित करने वाली घटनाओं की रेपोर्टिंग न होना है। हालांकि ऐसा सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान के मामले में ही नहीं है। हम अपने पड़ोसी देशों में लोगों की ज़िंदगियों के बारे में बहुत कम जानते हैं क्योंकि कवरेज के केंद्र में विदेशी संबंध और तनाव होते हैं। सिर्फ, जब कहीं संकट होता है जैसा कि हाल में नेपाल में हुआ या उससे पहले बांग्लादेश और श्रीलंका में हुआ, हम सरकारी नीतियों के कारण आम लोगों की दिक्कतों या चिरस्थायी चुनौतियों के बारे में जान पाए। इसका कारण मीडिया का प्रक्रिया के बजाय घटनाओं के प्रति ध्यान केंद्रित करना है।
अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण के समय 2021 में हमारे मीडिया में भी विस्तृत कवरेज हुआ था। जो बचकर निकलने की कोशिश कर रहे थे, उनके लिए यह नाटकीय, त्रासद और हिंसक था। पर उसके बाद के चार सालों में हम ऐसी सरकार के अधीन महिलाओं के हालात के बारे में कुछ नहीं जानते जो महिलाओं को बहिष्कृत करने को अपनी नीति का हिस्सा मानती है।
जहां तक अफगानिस्तान में महिला पत्रकारों की स्थिति है, रेपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान के तालिबान के नियंत्रण में जाते समय मीडिया में विभिन्न पदों पर 700 महिला पत्रकार कार्यरत थीं। आज इनकी संख्या 100 से भी कम है। एक ताज़ा सर्वे के अनुसार उनमें से 7 फीसदी से कम को अपना काम करने दिया जा रहा है। काइयों ने विदेशों में शरण मांगी है या फिर देश से बाहर के संस्थानों में रेपोर्टिंग करने पर सजा से बचने के लिए घर में रहने को मजबूर हैं।
अफगानिस्तान की इस सच्चाई को देखते हुए, महिलाओं को समान अधिकार देने वाले एक देश में एक प्रेस वार्ता से महिलाओं को बाहर रखने को लेकर सिर्फ महिला पत्रकार ही नहीं, सभी पत्रकारों को गुस्सा आना चाहिए था। यह कोई “तकनीकी” मुद्दा नहीं था, सोचा-समझा चयन था।
अफगानिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों पर फोकस रखने वाले कनाडा के मीडिया संस्थान ज़ैन टाइम्स की प्रधान संपादक जाहरा नादर ने इंडियन एक्स्प्रेस में “तालिबान लीडर इन इंडिया, इट्स कम्प्लिसिटी, नॉट डिप्लोमसी” शीर्षक से लिखे लेख में कहा है, “अफ़ग़ानी महिला पत्रकार के रूप में मैं आपको बताना चाहती हूँ कि इस संदेश का मतलब कया है। जब भारत सरकार तालिबान से महिलाओं के अधिकारों पर उनके रिकार्ड को सार्वजनिक रूप से चुनौती दिए बिना उनका स्वागत करती है तो यह कूटनीति की रेखा लांघकर संलिप्तता बन जाती है। यह ऐसे शासन को वैधता देती है जो महिलाओं के बहिष्कार पर बना है और उनके स्त्री जाति से द्वेष के सामान्यीकरण में साझीदार बन जाती है।”
(कल्पना शर्मा का लेख “न्यूजलांड्री” से साभार। अनुवाद महेश राजपूत)